पंजाब में आप का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट, 70 विधायकों की बगावत से बढ़ी मुश्किलें

2022 की ऐतिहासिक जीत के बाद पंजाब में कमजोर पड़ रही आप, बगावत ने बढ़ाई नेतृत्व की चिंता

चंडीगढ़: पंजाब की राजनीति में शुक्रवार को तब हलचल मच गई, जब आम आदमी पार्टी के 70 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नवनीत चतुर्वेदी को समर्थन देने की घोषणा की।

चतुर्वेदी ने सोमवार को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया था। शुरुआत में उनके साथ सिर्फ 10 विधायक थे, लेकिन गुरुवार शाम तक यह संख्या 70 तक पहुंच गई। पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार राजिंदर गुप्ता के खिलाफ यह कदम आप के संगठन और नेतृत्व शैली पर सवाल खड़े कर रहा है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में चतुर्वेदी ने कहा, “यह किसी व्यक्ति का नहीं, पंजाब की जनता का समर्थन है। आप के कई विधायक लंबे समय से इस बात से नाखुश हैं कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व राज्य के मुद्दों को गंभीरता से नहीं ले रहा। अब पंजाब की आवाज संसद में सुनी जाएगी।”

पार्टी सूत्रों के अनुसार, कई विधायकों को यह शिकायत है कि फैसले दिल्ली में लिए जाते हैं और राज्य की आवाज को नजरअंदाज किया जाता है। उनका मानना है कि राज्यसभा में पंजाब के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों को जगह मिलनी चाहिए, न कि बाहरी चेहरों को।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह सिर्फ वोटों की बात नहीं बल्कि भरोसे की कमी का संकेत है। 70 विधायकों का खुला समर्थन दिखाता है कि पार्टी के अंदर नाराजगी गहराई तक पहुंच चुकी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह असंतोष चुनाव के बाद भी खत्म नहीं होगा और पार्टी की पंजाब इकाई पर असर डाल सकता है।

दिल्ली में हार के बाद पंजाब आप का सबसे मजबूत राज्य माना जा रहा था, जहां 2022 में पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। लेकिन अब वही आधार कमजोर होता दिख रहा है। अगर 24 अक्टूबर को होने वाले राज्यसभा उपचुनाव में नवनीत चतुर्वेदी जीतते हैं, तो यह आप के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है और अन्य राज्यों में भी असंतोष बढ़ा सकता है।

यह पहली बार नहीं है जब आप में अंदरूनी मतभेद सामने आए हैं। 2015 में योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के बाहर किए जाने के बाद से पार्टी में सिद्धांत बनाम सत्ता की खींचतान जारी है। पंजाब की मौजूदा स्थिति उसी तनाव की अगली कड़ी मानी जा रही है।

एक ऐसी पार्टी, जो साफ राजनीति और जनता की आवाज के वादे पर बनी थी, अब अपने ही फैसलों और दिशा को लेकर सवालों के घेरे में है। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पार्टी इस संकट से उबर पाएगी या पंजाब की राजनीति में एक नई कहानी शुरू होने वाली है।

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