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अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में ग्रामीण बौद्ध धरोहर संरक्षण पर बनी राष्ट्रीय रणनीति की दिशा

भारत, नेपाल, रूस, थाईलैंड, श्रीलंका और अमेरिका के विशेषज्ञों ने साझा किए संरक्षण अनुभव

नई दिल्ली: नई दिल्ली में आयोजित ग्रामीण बौद्ध धरोहर सम्मेलन के दूसरे दिन संरक्षण-पद्धतियों, प्रशिक्षण, दस्तावेजीकरण और राष्ट्रीय अकादमी की स्थापना पर विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

यह सम्मेलन संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, इंटरनेशनल बौद्ध कन्फेडरेशन (IBC), गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, इंस्टीट्यूट ऑफ़ आर्कियोलॉजी, और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है, जिसमें विश्वभर के विद्वान, विशेषज्ञ और नीति निर्माता भाग ले रहे हैं।

दूसरे दिन का मुख्य उद्देश्य बौद्ध वास्तुकला संस्कृति, जीवंत परंपराओं और मूर्त एवं अमूर्त धरोहर के परस्पर संबंध के ज्ञान को और गहरा करना रहा। इस दौरान भारत, नेपाल, रूस, थाईलैंड, श्रीलंका और अमेरिका के विद्वानों ने संरक्षण प्रथाओं, सहभागिता आधारित दृष्टिकोण, ऐतिहासिक पुनर्निर्माण, कौशल विकास, सतत तीर्थयात्रा और धरोहर ज्ञान प्रणाली पर अपने अनुभव और दृष्टिकोण साझा किए।

दिन के प्रमुख सत्रों में नीति आयोग के , पूर्व चेयरमैन डॉ. अमिताभ कांत का संबोधन शामिल रहा। उन्होंने वैश्विक संघर्ष और अस्थिरता के बीच बौद्ध शिक्षाओं की समकालीन प्रासंगिकता पर जोर दिया। डॉ. कांत ने कहा कि भारत, बौद्ध सभ्यता का ऐतिहासिक केंद्र होने के नाते, अपने बौद्ध स्थलों के भौतिक और आध्यात्मिक आयामों के संरक्षण के लिए नैतिक जिम्मेदारी रखता है। उन्होंने कहा कि संरक्षण को राष्ट्रीय मिशन के रूप में देखा जाना चाहिए और ऐसा बौद्ध पर्यटन विकसित किया जाना चाहिए जो ज्ञान, चिंतन और समुदाय लाभ को बढ़ाए, न कि केवल भौतिक खपत को प्रोत्साहित करे।

“बौद्ध वास्तुकला, संस्कृति और उसके संरक्षण के ज्ञान के संवर्धन” सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रोफ़ेसर डॉ. अमरेश्वर गल्ला ने भारत में दस्तावेज़ीकरण, शैक्षणिक प्रशिक्षण और समुदाय-केंद्रित संरक्षण को सुदृढ़ बनाने की अपरिहार्य आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “भारत वही संरक्षित कर सकता है जिसे उसने पूरी तरह समझा हो। आज भी हजारों ग्रामीण बौद्ध स्थल बिना दस्तावेज़ और असुरक्षित हैं, और हमारी संस्थाओं में उन्हें संरक्षित रखने के लिए आवश्यक क्षमता, प्रशिक्षण और कानूनी जागरूकता का अभाव है। हमें मानचित्रण, डिजिटल दस्तावेज़ीकरण और समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण में त्वरित निवेश करना होगा और विश्वविद्यालयों को आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय धरोहर कानून और भारत-केंद्रित धरोहर अध्ययन के पाठ्यक्रमों के साथ तुरंत सशक्त बनाना होगा।”

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से डॉ. प्रजापति त्रिवेदी ने उन देशों से सीखने की आवश्यकता पर जोर दिया जिनमें बौद्ध आबादी अधिक है और जिन्होंने अपने धरोहर का सफलतापूर्वक संरक्षण किया है। उन्होंने अगले वर्ष के सम्मेलन के लिए “धरोहर संरक्षण के ऑस्कर” के रूप में अंतरराष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं की प्रदर्शनी प्रस्तावित की, जिसमें मापनीय मानक, “जीवंत धरोहर” की सुरक्षा और धरोहर प्रबंधन के लिए मजबूत संस्थागत ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया।

दिन भर के सत्रों में प्रस्तावित राष्ट्रीय अकादमी पर गहन चर्चा हुई, जिसे आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा नगर्जुनकोण्डा में पाँच एकड़ भूमि पर स्थापित किया जाएगा। सत्रों में अकादमी के पाठ्यक्रम की आधारशिलाओं, कौशल विकास, शिक्षण पद्धति, ज्ञान प्रणाली, भौतिक संस्कृति, संरक्षण नैतिकता, समुदाय सहभागिता और क्षमता निर्माण पर विशेष ध्यान दिया गया। यह अकादमी न केवल असुरक्षित ग्रामीण बौद्ध धरोहर के संरक्षण के लिए समर्पित है, बल्कि ग्रामीण समुदायों को धरोहर-संबंधित आर्थिक अवसरों के माध्यम से सशक्त बनाने के उद्देश्य से भी पहली बार स्थापित की जा रही है।

इस सम्मेलन के द्वारा ITRHD ने अपने उद्देश्य को दोहराया है कि ग्रामीण धरोहर का संरक्षण केवल सांस्कृतिक संरक्षण ही नहीं, बल्कि सतत आर्थिक विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण के लिए भी अनिवार्य है। भारत की ग्रामीण धरोहर में स्मारक, कृषि परंपराएं, शिल्प, जल प्रथाएं, भाषाएं, प्रदर्शन कला और औषधीय ज्ञान शामिल हैं। ITRHD का लक्ष्य नीति, समन्वय और समुदाय सहभागिता में अंतर पाटकर धरोहर-आधारित ग्रामीण विकास को सशक्त बनाना है।

दूसरे दिन की चर्चाओं ने ग्रामीण बौद्ध धरोहर संरक्षण और राष्ट्रीय अकादमी की स्थापना के भविष्य के लिए स्पष्ट दिशा प्रदान की। अंतिम दिन में सम्मेलन सिफारिशों को संकलित करने, व्यावहारिक रणनीतियों तय करने और भारत की बौद्ध धरोहर संरक्षण में वैश्विक नेतृत्व भूमिका को सशक्त बनाने पर केंद्रित रहेगा।

 

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