गांधीवादी आदर्शों को ध्यान में रखते हुए आईटीआरएचडी ने ग्रामीण पर्यटन दिवस मनाया और कृषि पर्यटन को बढ़ावा दिया

गांधीवादी आदर्शों के अनुरूप आत्मनिर्भर गांवों और रोजगार सृजन के लिए ग्रामीण पर्यटन पर जोर

नई दिल्ली: 30 जनवरी, 2026 को आईटीआरएचडी ने महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर ग्रामीण पर्यटन दिवस आयोजित किया। कार्यक्रम का उद्देश्य गांधीजी के ग्राम-स्वावलंबन आदर्शों के अनुरूप ग्रामीण क्षेत्रों में सतत विकास को बढ़ावा देना था।

कार्यक्रम में आईटीआरएचडी के चेयरमैन एस.के. मिश्रा, कृषि पर्यटन के प्रणेता पांडुरंग तावरे, वास्तुकार एवं शहरी नियोजक ए.जी. कृष्णन मेनन तथा विकास क्षेत्र की विशेषज्ञ मॉरीन लिबेल उपस्थित रहीं। भारत में कृषि पर्यटन अवधारणा के जनक माने जाने वाले पांडुरंग तावरे इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे।

आईटीआरएचडी द्वारा 30 जनवरी को ग्रामीण पर्यटन दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि विरासत पर्यटन, पारंपरिक शिल्प और समुदाय आधारित पहलों के माध्यम से ग्रामीण भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक संभावनाओं को रेखांकित किया जा सके। यह दिन महात्मा गांधी की पुण्यतिथि होने के साथ-साथ इस विश्वास को भी मजबूत करता है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके गांवों में निहित है। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय रोज़गार सृजन, पलायन में कमी, महिलाओं और युवाओं को सशक्त बनाना तथा पारंपरिक कौशल और विरासत का संरक्षण करना है।

अपने उद्घाटन संबोधन में एस.के. मिश्रा ने विकास के साथ-साथ ग्रामीण विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने नवंबर 2025 में आयोजित ग्रामीण बौद्ध विरासत के संरक्षण पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उल्लेख किया, जिसमें प्रशिक्षण, समन्वित संरक्षण योजना और समुदाय क्षमता निर्माण पर केंद्रित देश की पहली समर्पित अकादमी की परिकल्पना की गई थी।

मिश्रा ने कहा, “हर वर्ष 30 जनवरी को हम यह आयोजन महात्मा गांधी की स्मृति में करते हैं, जो गांवों के कल्याण के प्रति गहराई से प्रतिबद्ध थे। ग्रामीण पर्यटन में रोज़गार सृजन, बुनियादी ढांचे के विकास और समग्र प्रगति की अपार संभावनाएं हैं। इस वर्ष कृषि पर्यटन पर दिया गया ज़ोर गांव-आधारित अर्थव्यवस्थाओं को सतत रूप से मज़बूत करने की आवश्यकता को दर्शाता है।”

वास्तुकार एवं शहरी नियोजक ए.जी. कृष्णन मेनन ने कहा कि विरासत और विकास को साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब विरासत को सोच-समझकर विकास से जोड़ा जाता है, तो वह समावेशी और सतत विकास की उत्प्रेरक बन सकती है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मॉरीन लिबेल ने पश्चिमी राजस्थान में आईटीआरएचडी की जमीनी भागीदारी पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “बाड़मेर में आईटीआरएचडी का कार्य यह दर्शाता है कि किस प्रकार ग्रामीण पर्यटन को शिल्प शिक्षा और पारिस्थितिकी की समझ से जोड़ा जा सकता है। मरुस्थलीय शिल्प और स्थानीय ज्ञान प्रणालियों को समर्थन देकर ऐसी पहलें न केवल आजीविका के अवसर पैदा करती हैं, बल्कि समुदायों को अपनी सांस्कृतिक पहचान और संवेदनशील पारिस्थितिकी को बनाए रखने में भी मदद करती हैं।”

सभा को संबोधित करते हुए पांडुरंग तावरे ने कहा, “30 जनवरी केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। महात्मा गांधी का मानना था कि भारत अपने गांवों में बसता है, जहां आत्मनिर्भरता, श्रम की गरिमा और प्रकृति के साथ सामंजस्य विकास की बुनियाद हैं। कृषि पर्यटन इन गांधीवादी मूल्यों को व्यवहार में उतारता है—यह किसानों को उद्यमी बनाता है, परिवारों और युवाओं के लिए स्थानीय रोज़गार के अवसर पैदा करता है, ग्रामीण संस्कृति को संरक्षित करता है और कृषि को छोड़े बिना सतत आय के साधन विकसित करता है।”

तावरे ने महाराष्ट्र के उदाहरण साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार छोटे किसानों ने कृषि पर्यटन के माध्यम से घाटे में चल रहे खेतों को परिवार-आधारित सफल उद्यमों में बदला है। उन्होंने कहा कि कृषि पर्यटन किसानों को उपभोक्ताओं से सीधे जुड़ने, अपनी उपज के उचित दाम प्राप्त करने और गांवों के भीतर ही टिकाऊ आय मॉडल विकसित करने में मदद करता है। उन्होंने महाराष्ट्र की कृषि पर्यटन नीति का भी उल्लेख किया, जो भारत में अपनी तरह की पहली नीति है और जिसने राज्य के विभिन्न जिलों में हज़ारों किसानों को समर्थन दिया है।

कार्यक्रम का समापन आईटीआरएचडी द्वारा ग्रामीण पर्यटन और कृषि पर्यटन को सतत आजीविका, विरासत संरक्षण और महात्मा गांधी के आत्मनिर्भर गांवों के दृष्टिकोण को साकार करने के प्रभावी माध्यम के रूप में आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता के पुनः दोहराव के साथ हुआ।

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