इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल ने प्रवासी भारतीय दिवस पर दोहरी नागरिकता बहस को फिर किया प्रासंगिक

इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल ने प्रवासी भारतीय दिवस पर दोहरी नागरिकता नीति की समीक्षा की अपील की। “कीप द डोर ओपन” अभियान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप नए ढांचे की मांग करता है।

नई दिल्ली:

बदलते वैश्विक प्रवासन परिदृश्य के बीच, प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल ने “कीप द डोर ओपन” अभियान के माध्यम से दोहरी नागरिकता पर राष्ट्रीय बहस को फिर से सामने रखा।

इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल एक अंतरराष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य दुनिया भर में बसे भारतीय मूल के लोगों को एक साझा मंच पर जोड़ना है। यह संगठन गैर-पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करते हुए प्रवासी भारतीयों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श, नीति संवाद और रचनात्मक बातचीत को आगे बढ़ाता है। इस पहल की परिकल्पना श्री मेल्विन ने इस सोच के साथ की थी कि प्रवासी भारतीयों की एक साझा आवाज़ बने और भारत के साथ उनका जुड़ाव केवल औपचारिक या प्रतीकात्मक न रह जाए।

“कीप द डोर ओपन” अभियान इसी सोच को आगे बढ़ाता है। यह अभियान भारत में दोहरी नागरिकता पर लंबे समय से लागू प्रतिबंध पर पुनर्विचार की बात करता है और मानता है कि मौजूदा व्यवस्था आज की वैश्विक परिस्थितियों—जहां भारतीय पेशेवर, निवेशक और विशेषज्ञ दुनिया भर में सक्रिय हैं—के अनुरूप नहीं है। अभियान का स्पष्ट कहना है कि यह पहल राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ नहीं है, बल्कि एक ऐसे आधुनिक और सुरक्षित ढांचे की मांग करती है, जिससे विदेशी नागरिकता लेने के बाद भी प्रवासी भारतीय भारत से अपने औपचारिक संबंध बनाए रख सकें।

फिलहाल, भारतीय संविधान दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता। नागरिकता अधिनियम की धारा 9 के तहत किसी अन्य देश की नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाती है। इसके अलावा, पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अनुसार विदेशी नागरिकता प्राप्त करते ही भारतीय पासपोर्ट जमा करना अनिवार्य है। ये प्रावधान एक अलग दौर में बनाए गए थे, लेकिन आज के समय में इनके असर पर दोबारा विचार करना जरूरी हो गया है।

हालिया आंकड़े इस चिंता को और गहरा करते हैं। विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में करीब 1.63 लाख लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी। 2020 में यह संख्या 85,236 थी, जबकि 2019 में 1.44 लाख लोगों ने नागरिकता त्यागी। केवल तीन वर्षों—2019 से 2021—के बीच लगभग 3.92 लाख लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी, जिनमें से 43 प्रतिशत से अधिक ने अमेरिका की नागरिकता ली, जबकि बाकी अन्य देशों में नागरिक बने।

इस मौके पर इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल के चेयरमैन और संस्थापक मेल्विन चिरायथ ने कहा, “दोहरी नागरिकता का सवाल निष्ठा बंटने का नहीं है, बल्कि यह समझने का है कि आज की दुनिया में पहचान और जुड़ाव का स्वरूप बदल चुका है। जब प्रवासी भारतीयों को भारतीय नागरिकता छोड़नी पड़ती है, तो भारत उनसे जुड़े लंबे समय के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध भी खो देता है। ‘कीप द डोर ओपन’ अभियान ऐसी नीतियों की बात करता है जो वैश्विक हकीकत को स्वीकार करें और साथ ही भारत के हितों की रक्षा भी करें।”

अभियान यह भी स्पष्ट करता है कि दोहरी नागरिकता को स्पष्ट नियमों और सुरक्षा प्रावधानों के साथ लागू किया जा सकता है। कई लोकतांत्रिक देशों ने ऐसा किया है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हुए दोहरी नागरिकता की अनुमति दी गई है। भारत भी अपनी जरूरतों के हिसाब से एक संतुलित मॉडल विकसित कर सकता है।

इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल के कम्युनिकेशंस एंड आउटरीच प्रेसिडेंट मनोज शर्मा ने कहा, “प्रवासी भारतीय दिवस केवल उत्सव तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह सोचने का अवसर भी है कि हमारी नीतियां आज की वैश्विक परिस्थितियों से कितनी जुड़ी हुई हैं। नागरिकता छोड़ने वालों की बढ़ती संख्या साफ संकेत देती है कि मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। दोहरी नागरिकता पर खुला और गैर-पक्षपातपूर्ण संवाद अब जरूरी हो गया है।”

“कीप द डोर ओपन” अभियान किसी के वैश्विक अवसर चुनने या विदेश जाने के फैसले का विरोध नहीं करता। यह केवल यह सवाल उठाता है कि क्या विदेशी नागरिकता लेने के बाद भारत के साथ सभी कानूनी और नागरिक रिश्ते पूरी तरह खत्म हो जाने चाहिए—खासतौर पर तब, जब प्रवासी भारतीय आज भी भारत में निवेश कर रहे हैं, विदेशों में भारत की छवि को मजबूत कर रहे हैं और देश की प्रगति में योगदान दे रहे हैं।

 

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