“एक जुनून से जन आंदोलन तक” — एल.एन. झुंझुनवाला से मिले राजस्थान के युवा शतरंज सितारे

नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को मिली शतरंज के वास्तुकार से प्रेरणा, जिन्होंने शिक्षा और खेल का सेतु रचा

9 जून 2025, नई दिल्ली 

भारत में शतरंज को जनमानस तक पहुँचाने वाले दूरदर्शी उद्योगपति श्री एल.एन. झुंझुनवाला से राजस्थान के उभरते हुए तीन युवा शतरंज खिलाड़ी — आलोकिक माहेश्वरी, आराध्या उपाध्याय और हार्दिक शाह — ने प्रेरणास्पद भेंट की। उनके साथ कोच श्री प्रकाश पाराशर भी मौजूद थे। यह मुलाकात दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल ओपन ग्रैंडमास्टर्स टूर्नामेंट में भाग लेने के बाद, श्री झुंझुनवाला के आवास पर हुई।

ये खिलाड़ी विवेकानंद केंद्र विद्यालय, हुरड़ा से हैं — एक ऐसा स्कूल जिसे श्री झुंझुनवाला ने राजस्थान और मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और आत्मनिर्भरता की अलख जगाने हेतु स्थापित किया है। उन्होंने इन बच्चों में न केवल खेल के प्रति उत्साह देखा, बल्कि जीवन के प्रति अनुशासन और प्रतिबद्धता की झलक भी पाई। यह मुलाकात न केवल प्रेरणा का स्रोत बनी, बल्कि शतरंज जैसे खेल के जरिए जीवन मूल्यों के निर्माण की एक जीवंत मिसाल भी बनी।

श्री झुंझुनवाला का मानना है कि शतरंज केवल खेल नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। यह खेल मानसिक स्पष्टता, धैर्य और रणनीतिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है, जो हर छात्र और नागरिक के विकास में सहायक होता है। उन्होंने इस दर्शन को स्कूलों में शामिल कर शिक्षा और खेल के बीच एक ऐसा सेतु निर्मित किया है, जो भावी पीढ़ी को आत्मविश्वास और दिशा प्रदान करता है।

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उन्होंने 1973 में ‘नेशनल चेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ की स्थापना कर भारत में शतरंज के बुनियादी ढांचे को मजबूती दी। 1982 में उनके प्रयासों से भारत में पहला ग्रैंडमास्टर्स टूर्नामेंट आयोजित हुआ, जिसने विश्व में भारत की स्थिति को मजबूत किया। उन्होंने बॉटविनिक शतरंज अकादमी की स्थापना कर विश्वनाथन आनंद और अभिजीत गुप्ता जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया।

उनकी सोच केवल शतरंज तक सीमित नहीं रही। श्री झुंझुनवाला ने कराटे, योग, तीरंदाजी, निशानेबाजी और एथलेटिक्स जैसे खेलों को समान रूप से प्रोत्साहित किया, ताकि छात्र शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से सशक्त बन सकें। उन्होंने ‘चेस इंडिया’ नामक भारत की पहली शतरंज पत्रिका भी शुरू की, जो न केवल खेल संवाद को बढ़ावा देती है बल्कि भारत के अंदर प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का माध्यम भी बनी।

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