ब्लैक जुलाई : न्याय के इंतजार में जले सवाल, लुबना की कविता ने दिल छुआ

1983 श्रीलंका दंगों के पीड़ितों की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में साझा दर्द और जिम्मेदारी की बात

नई दिल्ली, 25 जुलाई 2025

श्रीलंका में तमिल समुदाय के विरुद्ध 1983 में हुए हिंसक दंगों की 41वीं बरसी के मौके पर दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में ‘ब्लैक जुलाई : ए डायरेक्ट एक्शन डे’ नामक स्मृति सभा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन हिंदू संघर्ष समिति द्वारा किया गया, जिसमें राजनेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कलाकारों ने भाग लेकर पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी और क्षेत्रीय एकता, न्याय व बहुलवाद पर चर्चा की। अखिल भारतीय अल्पसंख्यक मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष लुबना आसिफ ने मुख्य भाषण में कहा कि स्मृति केवल शोक की नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की भावना को जागृत करने का माध्यम है।

उन्होंने कहा, “स्मरण केवल दुख प्रकट करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सीखने, सच्चाई को मौन के विरुद्ध बोलने और यह सुनिश्चित करने का अवसर है कि ऐसी अमानवीय घटनाएं – श्रीलंका में, भारत में या कहीं भी – दोबारा न हों।”

लुबना आसिफ ने सांप्रदायिक घृणा के खतरों को रेखांकित करते हुए कहा, “दर्द का कोई धर्म नहीं होता, पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती। हमें मौन को सच्चाई का शत्रु नहीं बनने देना चाहिए।”

उन्होंने भारत में समावेशी शासन की दिशा में हो रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार की “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” पहल को समाज के वंचित वर्गों के उत्थान की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया।

कार्यक्रम में 1983 की उन घटनाओं को याद किया गया, जब कोलंबो में 13 श्रीलंकाई सैनिकों की हत्या के बाद भड़की हिंसा में तमिलों के घरों, दुकानों और मंदिरों को निशाना बनाया गया था। अनुमानतः 3,000 से अधिक लोगों की जान गई और हजारों को विस्थापित होना पड़ा। इस हिंसा ने श्रीलंका में जातीय तनाव को स्थायी रूप से गहरा कर दिया।

पूर्व सांसद और उत्तराखंड युद्ध स्मारक समिति के अध्यक्ष तरुण विजय ने भारत-श्रीलंका के सांस्कृतिक संबंधों की चर्चा करते हुए साझा विरासत की रक्षा और स्मृति के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

भारत हैबिटेट सेंटर के निदेशक के.जी. सुरेश, नोएडा फिल्म सिटी के संस्थापक संदीप मारवाह, और विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता डॉ. प्रवेश चौधरी ने भी अपने विचार साझा किए। सभी वक्ताओं ने इतिहास की सच्चाइयों से रूबरू होने और आज के संवेदनशील समाजों की सुरक्षा हेतु न्याय की मांग को दोहराया।

कार्यक्रम का समापन लुबना आसिफ द्वारा प्रस्तुत एक मार्मिक कविता से हुआ —
“ब्लैक जुलाई की राख में एक सवाल जलता है,
न्याय का पहिया कब मुड़ेगा?
हम नफरत या आरोपों के लिए नहीं जुटे,
बल्कि इसलिए कि कोई आत्मा फिर से आग में न जले।”

हिंदू स्ट्रगल कमेटी को इस संवेदनशील और अक्सर उपेक्षित ऐतिहासिक अध्याय पर संवाद की पहल के लिए विशेष रूप से सराहा गया। कार्यक्रम का समापन पीड़ितों की स्मृति में मौन श्रद्धांजलि और सामाजिक समरसता की प्रतिबद्धता के साथ हुआ।

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