विदेशी प्लेटफ़ॉर्म्स भारतीय निवेशकों से 1% टीडीएस बचाकर बना रहे हैं “छाया बाजार”

FIU की कार्रवाई और MeitY की वेबसाइट ब्लॉकिंग के बावजूद विदेशी प्लेटफ़ॉर्म्स का संचालन जारी

नई दिल्ली:

भारतीय क्रिप्टोकरेंसी कर ढाँचा दो स्तंभों — 30% टैक्स और 1% TDS — पर टिका है, पर ऑफशोर ट्रेडिंग ने इस ढाँचे की जड़ें हिला दी हैं। विदेशी प्लेटफ़ॉर्म्स के ज़रिए हो रहे लेन-देन से सरकार को टैक्स नुकसान और डेटा पारदर्शिता दोनों पर असर पड़ा है।

दिसंबर 2023 से वित्तीय खुफिया इकाई (FIU-IND) ने कई गैर-अनुपालक वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (VASPs) पर कार्रवाई की है। इन पर शो कॉज़ नोटिस जारी किए गए हैं और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) से इनके यूआरएल ब्लॉक करने का अनुरोध किया गया है। इसके बावजूद स्थिति लगभग वैसी ही बनी हुई है। भारतीय उपयोगकर्ता आज भी मोबाइल ऐप्स, मिरर वेबसाइट्स और वीपीएन के ज़रिए इन प्लेटफ़ॉर्म्स तक पहुँच पा रहे हैं, जिससे उनकी गतिविधियाँ टीडीएस के दायरे से बाहर बनी रहती हैं।

इन प्लेटफ़ॉर्म्स का मॉडल बेहद सरल है। बड़े ऑफशोर एक्सचेंज पीयर-टू-पीयर (P2P) चैनल उपलब्ध कराते हैं, जहाँ वे क्रिप्टो को एस्क्रो में रखते हैं और खरीदार-विक्रेता आपस में भुगतान सीधे UPI, Google Pay, PhonePe, या Paytm जैसे ऐप्स से करते हैं। एक्सचेंज यह ज़िम्मेदारी उपयोगकर्ताओं पर डाल देते हैं कि वे स्वयं टीडीएस काटें — इस तरह वे कानूनी दायित्व से बच निकलते हैं। यह व्यवस्था तेज़ और सस्ती ट्रेडिंग का रास्ता तो खोलती है, लेकिन टैक्स अधिकारियों के लिए पूरी तरह अदृश्य रहती है। एस्या सेंटर (Esya Centre) की 2024 रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2022 से अब तक ₹6,000 करोड़ से अधिक का टीडीएस एकत्र नहीं हो सका है, जिसमें दिसंबर 2023 से अक्टूबर 2024 के बीच ₹2,634 करोड़ शामिल हैं।

प्रवर्तन की गति बढ़ी है, लेकिन इसका असर असमान है। 28 दिसंबर 2023 को FIU-IND ने नौ ऑफशोर प्लेटफ़ॉर्म्स को नोटिस जारी किए और MeitY से उनके यूआरएल ब्लॉक करने का अनुरोध किया। यह एक स्पष्ट संदेश था कि भारतीय उपयोगकर्ताओं को सेवा देना PMLA के तहत दायित्व उत्पन्न करता है, चाहे एक्सचेंज कहीं भी स्थित हो। कुछ डोमेन अस्थायी रूप से ब्लॉक हुए, पर उपयोगकर्ता VPN और मोबाइल ऐप्स के ज़रिए इन तक पहुँचते रहे, और P2P लेन-देन का प्रवाह जारी रहा। 2024 में, दुनिया का सबसे बड़ा एक्सचेंज ₹18.82 करोड़ का जुर्माना भरकर FIU में पंजीकृत हुआ और मनी लॉन्ड्रिंग (AML) अनुपालन पूरा किया, लेकिन उसने अब तक 1% टीडीएस की स्वचालित कटौती शुरू नहीं की। इसके बाद 1 अक्टूबर 2025 को FIU-IND ने 25 ऑफशोर वीडीए सर्विस प्रोवाइडर्स को धारा 13 के तहत नोटिस भेजे और आईटी अधिनियम की धारा 79(3)(b) के अंतर्गत उनके ऐप्स और यूआरएल हटाने का अनुरोध किया। फिर भी मूल अंतर बना हुआ है — FIU PMLA अनुपालन देखता है, जबकि CBDT आयकर अधिनियम के तहत टीडीएस लागू करता है। जब तक एक्सचेंज भारतीय-केवाईसी उपयोगकर्ताओं के लिए स्रोत पर टीडीएस नहीं काटते, टैक्स ट्रेल अधूरा रहेगा।

इस स्थिति से एक और नुकसान होता है — लाभ पर आयकर का नुकसान। 1% टीडीएस का मकसद केवल कर संग्रह नहीं, बल्कि लेन-देन स्तर का डेटा उपलब्ध कराना भी था, ताकि धारा 115BBH के तहत घोषित लाभों को क्रॉस-वेरिफाई किया जा सके। जब लेन-देन ऑफशोर प्लेटफ़ॉर्म्स पर होते हैं और टीडीएस नहीं काटा जाता, तो वह जानकारी AIS/26AS तक पहुँचती ही नहीं। नतीजतन, प्रवर्तन प्रणाली अपने सबसे महत्वपूर्ण डेटा स्रोत से वंचित रह जाती है। अध्ययनों के अनुसार, यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो न केवल अविकसित टीडीएस संग्रह बढ़ेगा, बल्कि 30% लाभ कर की अधो-घोषणा (under-reporting) भी व्यापक हो जाएगी — एक ऐसा नुकसान जिसे सही नीति-संशोधन से रोका जा सकता है।

इस अंतर को पाटने के लिए नीतियों का समन्वय आवश्यक है। PMLA पंजीकरण से मनी लॉन्ड्रिंग और आतंक वित्तन (CFT) पर नियंत्रण सुनिश्चित होता है, लेकिन आयकर अधिनियम में यह स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट होना चाहिए कि किसी भी प्लेटफ़ॉर्म द्वारा की गई P2P ट्रेडिंग धारा 194S के अंतर्गत मानी जाएगी। ऐसे मामलों में, जब लेन-देन का कोई भी पक्ष भारतीय निवासी हो, एक्सचेंज को ही “टीडीएस काटने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति” माना जाना चाहिए। इसके साथ ही, कम दर वाले टीडीएस को मजबूत तृतीय-पक्ष रिपोर्टिंग के साथ जोड़ा जा सकता है, ताकि अनुपालन बढ़े और व्यापार पर दबाव न पड़े।

फिलहाल, वास्तविकता यह है कि कई ऑफशोर प्लेटफ़ॉर्म्स — कुछ FIU-पंजीकृत और कुछ पूरी तरह अपंजीकृत — भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए आसानी से उपलब्ध हैं। उनका सबसे बड़ा आकर्षण लीवरेज या वैश्विक लिस्टिंग नहीं, बल्कि बिना टीडीएस वाला, आसान P2P ट्रेडिंग अनुभव है। जब तक यह loophole बना रहेगा, भारत न केवल स्रोत पर 1% कर खोता रहेगा, बल्कि 30% लाभ कर लागू करने के लिए आवश्यक पारदर्शिता भी। समाधान के उपकरण — क़ानून, निगरानी व्यवस्था और नीतिगत पुनर्रचना — पहले से मौजूद हैं। अब चुनौती यह है कि नीति-निर्माण इन सभी को कितनी तेजी और सटीकता से जोड़ पाता है, ताकि इस “छाया बाजार” को फिर से रोशनी में लाया जा सके।

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