बीजेपी सरकार पर दोहरे मापदंडों का आरोप, डॉ. पॉल ने चेताया लोकतांत्रिक संकट

चयनात्मक न्याय पर सवाल, कहा—पीड़ितों की अनदेखी और राजनीतिक निष्ठा के आधार पर तय हो रही जवाबदेही

नई दिल्ली:

प्रजा शांति पार्टी के संस्थापक डॉ. के. ए. पॉल का कहना है कि बीजेपी शासन में संवैधानिक संस्थाओं का पक्षपातपूर्ण उपयोग हो रहा है, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर संकट पैदा हो गया है।

राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा अभिनेता शिवाजी को एक सार्वजनिक चर्चा में दिए गए बयान के मामले में तलब किए जाने का उल्लेख करते हुए डॉ. पॉल ने कहा कि यह कार्रवाई असंतुलित और राजनीतिक सोच से प्रेरित है। उन्होंने कहा, “शिवाजी आयोग के सामने पेश हुए और उन्होंने माफी भी मांगी। किसी का अपमान करने की उनकी मंशा नहीं थी। इसके बावजूद उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने बीजेपी सरकार पर सवाल उठाए और नेहरू–गांधी परिवार के बारे में सकारात्मक बात की।”

डॉ. पॉल ने इसके उलट राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में पूरी चुप्पी पर सवाल खड़े किए। उन्होंने अभिनेता और बीजेपी गठबंधन की सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के विधायक नंदमुरी बालकृष्ण का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं को लेकर राष्ट्रीय मंच पर बेहद आपत्तिजनक और उससे भी गंभीर टिप्पणियों के बावजूद किसी भी महिला अधिकार संस्था ने हस्तक्षेप नहीं किया।
उन्होंने कहा, “न कोई समन, न माफी, न जवाबदेही। उल्टा, इसी साल उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। यह दिखाता है कि कानून किस तरह चुनिंदा लोगों पर लागू किया जाता है।”

डॉ. पॉल ने उत्तर प्रदेश के पूर्व बीजेपी विधायक सेंगर का भी जिक्र किया, जिन्हें सीबीआई जांच के बाद बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया था। उन्होंने कहा कि पीड़िता द्वारा बार-बार अपनी जान को खतरा बताए जाने के बावजूद लगातार जमानत दी जा रही है, जो यह उजागर करता है कि व्यवस्था ताकतवरों को बचाती है और पीड़ितों को असुरक्षित छोड़ देती है।
उन्होंने कहा, “दोषी ठहराए गए लोगों को बार-बार राहत मिल रही है, जबकि सरकार से सवाल करने वालों को दंडित किया जा रहा है। यह कानून का राज नहीं है।”

डॉ. पॉल के अनुसार, ऐसी कार्रवाइयों से भारतीय जनता पार्टी के शासन में जनता का भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है। उन्होंने कहा, “नागरिकों की रक्षा के लिए बनी संस्थाओं का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए किया जा रहा है। इससे भारत की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और अर्थव्यवस्था—देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर—दोनों को नुकसान पहुंच रहा है।”

उत्तर भारत के कई हिस्सों—उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और राजस्थान—में ईसाइयों पर हो रहे हमलों पर चिंता जताते हुए डॉ. पॉल ने कहा कि सरकारी आश्वासनों और जमीनी हकीकत के बीच साफ अंतर है। उन्होंने कहा, “सिर्फ चर्च जाने के कारण लोगों पर हमले हो रहे हैं। यह हिंसा भारत के सामाजिक ताने-बाने, अर्थव्यवस्था और वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचा रही है।”

डॉ. पॉल ने बीजेपी सरकार से बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई करने की मांग की। उन्होंने कहा, “चयनात्मक न्याय देश को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर करेगा। सरकार को हर नागरिक की समान रूप से रक्षा करनी चाहिए और संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना बंद करना चाहिए।”

नागरिकों से अपील करते हुए डॉ. पॉल ने जिस स्थिति को “खतरनाक पैटर्न” बताया, उस पर ध्यान देने की बात कही। उन्होंने कहा, “यह मामला किसी एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है। यह इस बात से जुड़ा है कि देश किस दिशा में जा रहा है। अगर नागरिक आज चुप रहे, तो कल उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।”

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