ग्लोबल साउथ की दिशा और ब्रिक्स के भविष्य पर एमईआरआई डायलॉग 6.0 में गंभीर विमर्श

भारत की आगामी ब्रिक्स अध्यक्षता और वैश्विक दक्षिण की सशक्त भागीदारी पर विशेष चर्चा

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन एमईआरआई डायलॉग 6.0 में ब्रिक्स के रणनीतिक आयामों और ग्लोबल साउथ की सशक्त भागीदारी पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।

एमईआरआई ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के उपाध्यक्ष प्रो. ललित अग्रवाल ने गणमान्य अतिथियों, संकाय सदस्यों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए एमईआरआई डायलॉग की स्थापना से लेकर इसके छठे संस्करण तक की यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने युवा मस्तिष्कों को अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अनुभवी विशेषज्ञों के अनुभव से जोड़ने के महत्व पर बल दिया।

एमईआरआई सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज के प्रमुख एवं इंडिया सेंट्रल एशिया फाउंडेशन के निदेशक प्रो. डॉ. रामाकांत द्विवेदी ने सम्मेलन के उद्देश्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की। कजाकिस्तान और फिनलैंड में भारत के पूर्व राजदूत एंबेसडर अशोक कुमार शर्मा ने अपने उद्घाटन भाषण में वैश्विक शासन, आर्थिक एकीकरण, तकनीकी साझेदारी, दक्षिण-दक्षिण सहयोग तथा संभावित साझा ब्रिक्स मुद्रा में ब्रिक्स की रणनीतिक भूमिका को रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने संस्थागत सीमाएं, भू-राजनीतिक तनाव और कार्यान्वयन की चुनौतियों का भी उल्लेख किया।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि रूस के मिखाइल पोनस्टर ने सम्मेलन के लिए शुभकामनाएं दीं। त्रिवेणी एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी के माननीय अध्यक्ष एवं एमईआरआई ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के अध्यक्ष आई. पी. अग्रवाल ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में भारत की आगामी अध्यक्षता, सदस्य देशों के बीच सहयोग को सुदृढ़ करने तथा ग्लोबल साउथ की आवाज को सशक्त करने में भारत की भूमिका पर प्रकाश डाला।

सम्मेलन के दौरान “इंडिया एंड यूरोप: चुनौती एवं अवसर” पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया। पुस्तक पर प्रकाश डालते हुए डॉ. एस. एस. मिश्रा ने बताया कि यह पुस्तक भारत-यूरोप के ऐतिहासिक संबंधों, सभ्यतागत एवं सांस्कृतिक जुड़ाव तथा भविष्य की बदलती गतिशीलता का विश्लेषण करती है, जैसा कि यूरोपीय संघ-भारत मुक्त व्यापार समझौते जैसे विकासक्रम में परिलक्षित होता है।

पहला तकनीकी सत्र, जिसकी अध्यक्षता प्रो. एस. डी. मुनी (प्रोफेसर एमेरिटस, जेएनयू) ने की, ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के बीच सहयोग बढ़ाने की भूमिका पर केंद्रित रहा। उन्होंने केवल वक्तव्यों से आगे बढ़कर ठोस परिणाम देने और मानव विकास व समावेशी सहयोग पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस सत्र में रूस के डॉ. वादिम बी. कोज़्यूलिन, जेएनयू के प्रो. श्रीकांत कोंडापल्ली, इथियोपिया के डॉ. योनास अडेये अडेटो, उज़्बेकिस्तान के प्रो. अब्दुसमत ए. खायदरोव, चीन की डॉ. रैचेल रूडोल्फ और जेएनयू के प्रो. अजय दुबे ने सुरक्षा, साइबर खतरों, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा, कृषि, आपदा प्रबंधन, डिजिटल अवसंरचना, सुशासन तथा ग्लोबल साउथ में अफ्रीका की बढ़ती भूमिका जैसे विषयों पर विचार रखे।

दूसरा तकनीकी सत्र, जिसकी अध्यक्षता लेफ्टिनेंट जनरल पी. जे. एस. पन्नू (सेवानिवृत्त) ने की, “ब्रिक्स: टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन” विषय पर केंद्रित रहा। इसमें वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, भारत के विकसित होते सेटकॉम क्षेत्र, सेमीकंडक्टर उद्योग और उभरते तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र पर चर्चा हुई। सेमीकंडक्टर क्षेत्र में डिजाइन से निर्माण तक आगे बढ़ने, डिजिटल सुदृढ़ता, साइबर सुरक्षा और समन्वित नीतियों की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया।

तीसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. वी. के. जैन ने की, जो ग्लोबल साउथ में आपूर्ति श्रृंखलाओं, स्थिरता और आर्थिक साझेदारी में ब्रिक्स के योगदान पर केंद्रित था। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने, न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से हरित अवसंरचना वित्तपोषण, जिम्मेदार नेतृत्व और समग्र स्थिरता पर प्रकाश डाला गया। साथ ही आपूर्ति श्रृंखलाओं के ‘नर्वस सिस्टम’ के रूप में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका, उसके औद्योगिक रणनीतिक उपयोग तथा ग्लोबल साउथ में ठोस विकास के लिए प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग पर विचार प्रस्तुत किए गए।

कार्यक्रम का समापन डीन प्रो. दीपशिखा कालरा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों, सत्र अध्यक्षों, वक्ताओं और आयोजकों के योगदान की सराहना की।

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