वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर कराधान: वैश्विक अनुभव भारत में नीति सुधार की मांग क्यों करता है?

दिलीप चेनॉय
Chairperson, Bharat Web3 Association

पिछले पांच–छह वर्षों में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के कराधान को लेकर वैश्विक विमर्श में बड़ा बदलाव आया है। शुरुआती दौर में, जब यह एसेट क्लास नया था और संस्थागत स्तर पर अनिश्चितता बनी हुई थी, तब कई देशों ने कर नीति को एक नियंत्रण उपकरण के रूप में अपनाया। उद्देश्य था—तेजी से बढ़ रहे इस नए क्षेत्र को अनुशासित करना। लेकिन समय के साथ अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह स्पष्ट करता गया कि यदि कर व्यवस्था संतुलित और व्यावहारिक न हो, तो उसका असर उलटा पड़ता है। ऐसे कर ढांचे अनुपालन को कमजोर करते हैं, पूंजी को देश से बाहर जाने के लिए प्रेरित करते हैं और घरेलू बाजार के विकास में बाधा बनते हैं। इसी कारण अनेक देशों ने कर नीति और नियामक निगरानी के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार किया है। इस उभरती वैश्विक समझ के संदर्भ में भारत का मौजूदा वर्चुअल डिजिटल एसेट्स कर ढांचा अब असंतुलित नजर आता है और उसमें सुधार की आवश्यकता महसूस होती है।

यदि वैश्विक कर व्यवस्थाओं पर नजर डाली जाए, तो विभिन्न क्षेत्रों में नीति समायोजन का एक समान पैटर्न दिखाई देता है। एशिया में कई ऐसे क्षेत्राधिकार हैं जिन्होंने शुरुआत में आक्रामक कर उपायों पर विचार किया या उन्हें लागू भी किया, लेकिन बाद में अपने रुख में नरमी लाई। थाईलैंड इसका प्रमुख उदाहरण है। वहां वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर कैपिटल गेन टैक्स और विदहोल्डिंग टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन बाद में नीति में बदलाव करते हुए पंजीकृत घरेलू एक्सचेंजों के माध्यम से हुए लाभ पर बहुवर्षीय कर छूट दी गई। साथ ही, ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स के प्रति सख्त रुख बनाए रखा गया। इस बदलाव का उद्देश्य अल्पकालिक राजस्व त्याग की कीमत पर गतिविधियों को विनियमित प्लेटफॉर्म्स की ओर मोड़ना, निगरानी को मजबूत करना और संस्थागत व उच्च-निवल-मूल्य निवेशकों को आकर्षित करना था। इस नीति को सट्टेबाजी को बढ़ावा देने के बजाय प्रतिस्पर्धात्मकता और इकोसिस्टम निर्माण के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया।

जापान ने एक अलग लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण रास्ता अपनाया। वहां यह समझा गया कि पहले की कर व्यवस्था घरेलू नवाचार और कंपनियों के गठन को हतोत्साहित कर रही थी। इसके बाद कुछ कॉर्पोरेट टोकन गतिविधियों के लिए कर आधार को सीमित किया गया—जैसे जारी करने वाली संस्थाओं के लिए अवास्तविक लाभ को कर से मुक्त करना और निवेशकों को नुकसान की समायोजन सुविधा देना। इन सुधारों का उद्देश्य वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के कराधान को व्यापक कॉर्पोरेट वित्त सिद्धांतों के अनुरूप बनाना था, साथ ही विनियमित मध्यस्थों के लिए रिपोर्टिंग और प्रकटीकरण की जिम्मेदारियों को मजबूत करना भी शामिल था। महत्वपूर्ण यह है कि जापान में कर सुधार को नियामक स्पष्टता और निगरानी के साथ जोड़ा गया, न कि उसे डराने वाले उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया।

दक्षिण कोरिया ने कर लागू करने में विलंब की रणनीति अपनाई। हालांकि वहां वर्चुअल डिजिटल एसेट्स से होने वाले लाभ पर कर लगाने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन को बार-बार टाला गया है। नीति निर्माताओं ने प्रशासनिक जटिलताओं, मूल्यांकन की चुनौतियों और गतिविधियों के विदेश जाने के जोखिम को इसके कारणों के रूप में बताया है। यह दृष्टिकोण इस बात की स्वीकारोक्ति है कि मजबूत रिपोर्टिंग और निगरानी ढांचे के बिना जल्दबाजी में कर लागू करना उल्टा असर डाल सकता है।

यूरोपीय देशों में भी लेनदेन-स्तरीय कर से दूरी दिखाई देती है। जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने आय की पहचान और कैपिटल गेन के आधार पर कर व्यवस्था तैयार की है, जहां दीर्घकालिक होल्डिंग्स के लिए छूट दी जाती है। इसका उद्देश्य उच्च-आवृत्ति वाले बाजारों पर बोझ डालने वाले टर्नओवर टैक्स से बचना है। यूरोपीय संघ स्तर पर सेवा प्रदाताओं के लिए समन्वित नियमन को प्राथमिकता दी गई है, और कर नीति को उसी ढांचे के भीतर विकसित किया गया है।

कुछ क्षेत्राधिकारों ने ‘रेगुलेशन-फर्स्ट’ दृष्टिकोण अपनाया है। सिंगापुर और हांगकांग ने लाइसेंसिंग, गवर्नेंस मानकों, आवश्यक सावधानियों और प्रकटीकरण दायित्वों को प्राथमिकता दी है। यहां कर नीति अपेक्षाकृत तटस्थ और लागू करने में आसान है, जो मौजूदा आयकर सिद्धांतों पर आधारित है। उद्देश्य यह है कि गतिविधियां देश के भीतर, एक विनियमित दायरे में रहें और अनुपालन के जरिए कर आधार सुरक्षित रहे।

संयुक्त राज्य अमेरिका का अनुभव भी शिक्षाप्रद है। वहां संघीय और राज्य स्तर पर नियमन का फोकस मध्यस्थों की निगरानी और स्टेबलकॉइन्स पर है, जबकि कर प्रवर्तन मुख्य रूप से स्थापित सूचना रिपोर्टिंग प्रणालियों पर आधारित है। हर वर्चुअल डिजिटल एसेट ट्रांसफर पर लेनदेन-स्तरीय विदहोल्डिंग टैक्स लगाने की कोई पहल नहीं हुई है।

उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भी विविध रणनीतियां देखने को मिलती हैं। ब्राजील में केंद्रीय बैंक को निगरानी अधिकार देने वाला ढांचा विकसित हो रहा है और कर नीति नियामक क्षमता के साथ आगे बढ़ रही है। तुर्की ने वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर कर लगाने के पुराने प्रस्तावों से पीछे हटते हुए उनके भुगतान के रूप में उपयोग को सीमित किया है। अफ्रीका में केन्या ने हितधारकों से संवाद के बाद प्रस्तावित डिजिटल एसेट टैक्स को वापस ले लिया और विनियमित गतिविधियों को सक्षम बनाने पर जोर दिया।

अंतरराष्ट्रीय मानक निर्धारण संस्थाएं भी नियमन और कराधान के इस अंतर को रेखांकित करती हैं। वैश्विक ढांचे लाइसेंसिंग, निगरानी, रिपोर्टिंग और सीमा-पार सहयोग को प्रमुख उपकरण मानते हैं। कराधान को एक सहायक नीति क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, जो नियामक स्पष्टता के बाद आता है, न कि उसके स्थान पर।

इस पृष्ठभूमि में भारत का मौजूदा दृष्टिकोण अलग-थलग दिखाई देता है। Finance Act, 2022 के तहत लागू व्यवस्था वर्चुअल डिजिटल एसेट्स से होने वाले लाभ पर 30 प्रतिशत फ्लैट टैक्स और हर ट्रांसफर पर 1 प्रतिशत TDS लगाती है, जबकि नुकसान की समायोजन या आगे ले जाने की अनुमति नहीं देती। हालांकि इसका उद्देश्य ट्रेसबिलिटी बढ़ाना और सट्टेबाजी पर अंकुश लगाना बताया गया, लेकिन व्यवहार में इसने भारतीय उपयोगकर्ताओं को ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स और पीयर-टू-पीयर चैनलों की ओर धकेल दिया है। घरेलू एक्सचेंजों पर वॉल्यूम में भारी गिरावट आई है और गतिविधियों का बड़ा हिस्सा नियामकों की पहुंच से बाहर चला गया है।

राजस्व के आंकड़े भी नीति की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हैं। 1 प्रतिशत TDS उच्च-आवृत्ति और कम-मार्जिन वाले बाजार में एक तरह से टर्नओवर टैक्स बन जाता है, जो ट्रेडिंग कैपिटल को तेजी से खत्म करता है और अंततः कुल कर संग्रह को घटा देता है। इसके विपरीत, कम दर या मजबूत रिपोर्टिंग तंत्र अपनाने से तरलता बनी रह सकती है और मध्यम अवधि में अधिक राजस्व प्राप्त हो सकता है।

संरचनात्मक रूप से देखें तो भारत का ढांचा राजस्व संग्रह, ट्रेसबिलिटी और बाजार जोखिम प्रबंधन—तीनों को एक ही उपाय में समेटने की कोशिश करता है। जबकि अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि ट्रेसबिलिटी प्लेटफॉर्म-स्तरीय रिपोर्टिंग और लाइसेंस प्राप्त मध्यस्थों के जरिए बेहतर तरीके से हासिल की जा सकती है।

तुलनात्मक अनुभव तीन स्पष्ट सिद्धांतों की ओर इशारा करता है—तटस्थता, प्रशासनिक व्यावहारिकता और नियामक समन्वय। वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को अन्य वित्तीय एसेट्स की तरह कर दायरे में लाना, बाजार की कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचाए बिना अनुपालन सुनिश्चित करना और एक सुसंगत नियामक ढांचे के भीतर कर नीति को संचालित करना, यही आगे का रास्ता है।

आज वर्चुअल डिजिटल एसेट्स वैश्विक वित्तीय प्रणाली का स्थापित हिस्सा बन चुके हैं। जिन देशों ने कर नीति को नियमन के साथ संतुलित किया है, वे घरेलू गतिविधियों को बनाए रखने, अनुपालन सुधारने और स्थायी राजस्व सुनिश्चित करने में सफल रहे हैं। भारत के पास भी वैश्विक अनुभव और घरेलू साक्ष्यों के आधार पर अपनी नीति को पुनर्संतुलित करने का स्पष्ट अवसर है।

Related Posts

भारत की क्रिप्टो टैक्स नीति की उलटी मार: नियंत्रण की जगह नियंत्रण से बाहर होता सेक्टर

1% टीडीएस के बाद भारत से बाहर शिफ्ट हुआ अधिकांश क्रिप्टो ट्रेडिंग वॉल्यूम नई दिल्ली: दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार ने संसद में पहली बार यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार…

Continue reading
स्टेबलकॉइन: प्रयोग से नियमन की ओर

अमेरिका से चीन तक, स्टेबलकॉइन पर सख़्त होता सरकारी रुख नई दिल्ली: नियामक अब स्टेबलकॉइन को एक सीमित तकनीकी प्रयोग के रूप में नहीं देख रहे। उनकी तेज़ वृद्धि—120 अरब…

Continue reading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed

The Ultimate Guide to Live Online Roulette

Live Roulette Online Real Money: A Comprehensive Guide

Ruleta con giros gratis para Mac: Una experiencia de juego única

El Mejor Casino de Ruleta Certificada en España

Play Roulette Online India: A Comprehensive Review

The Ultimate Guide to Live European Roulette in the USA